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समुद्र में बनी इस दरगाह पर हर धर्म के लोग इबादत करने जाते हैं। मान्यता है कि जो भी यहां आता है उसकी सभी मुराद पूरी होती है। दरगाह 1431 में बनाई गई थी।
हाजी अली दरगाह एक ऐसी दरगाह है जहां धर्म का कोई बंधन नहीं है। यहां हर जाति के लोग इबादत करने आते हैं। हाजी अली दरगाह के नाम से मशहूर यह दरगाह हाजी अली शाह बुखारी की हैं।

15 वीं शताब्दी में मुंबई के वरली में स्थित समुद्र के किनारे हाजी अली की इस दरगाह को बनाया गया था। दरगाह जमीन से कम से कम 500 गज दूर समु्द्र के अंदर बनी हुई है।
इस दरगाह तक पंहुचने के लिए लोगों को लंबा रास्ता तय करना पड़ता है। इसके लिए सीमेंट का पुल बना हुआ है। जोकि दोनो ओर से समुद्र से घिरा हुआ है। यहां पर हमेशा ज्वार आता रहता है। जिसके कारण यहां का पुल बंद कर दिया जाता है।
ज्वार के वक्त चढ़े हुए समुद्र के पानी की एक बूंद भी इस दरगाह के भीतर नहीं जाती हैं। यह चमत्कार ही है। कहा जाता है कि पीर हाजी अली शाह ने शादी नहीं की थी और उनके बारे में जो कुछ मालूम चला है वो दरगाह के सज्जादानशीं, ट्रस्टी और पीढ़ी दर पीढ़ी से सुनी जा रहे क़िस्सों से ही चला है।

जब अपनी मां की अनुमति लेकर व्यापार करने पहली बार अपने घर से निकले थे तब मुंबई वरली के इसी इलाक़े में रहने लगे थे। यहां पर रहते हुए उन्हें यह महसूस हुआ कि वह अपने आगे का जीवन यहीं पर अपने धर्म का प्रचार करते हुए बिताएंगे। जिसके कारण इन्होनें अपनी मां को खत लिखकर इसकी जानकारी दी। साथ ही अपनी पूरी धन-संपत्ति जरुरतमंदों में बांट कर प्रचार करने लगे।

हाजी अली सबसे पहले हज की यात्रा पर गए लेकिन इस यात्रा के दौरान उनकी मौत हो गई। इस बारे में ऐसी मान्यता हैं कि हाजी अली की अतिम इच्छा थी कि उनको दफनाया न जाए बल्कि उनके कफन को समुद्र में डाल दिया जाए।

इसी कारण उनका ताबूत अरब सागर में होता हुआ मुंबई की इसी जगह पर आ रुका और आश्चर्य की बात ये ताबूत न डूबा न उसके अंदर पानी गया। यहां पर आकर एक चट्टान में आकर रुक गया। इसके बाद उसी जगह पर 1431 में उनकी याद में दरगाह बनाई गई।
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